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जीत का नशा: अभिमानी विक्रम और विनम्रता की सीख

पढ़िए 'जीत का नशा' पर आधारित विक्रम की कहानी। कैसे लगातार जीत के घमंड ने एक होनहार धावक को मुश्किल में डाल दिया और उसने जीवन का सबसे बड़ा सबक सीखा।

By Lotpot
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सफलता और जीत हमारे जीवन का लक्ष्य होती हैं, लेकिन जब जीत 'नशा' बन जाए, तो वह इंसान को अंधा कर देती है। "जीत का नशा" एक ऐसा शब्द है जो बताता है कि कैसे अहंकार हमारी आँखों पर पट्टी बाँध देता है और हम अपनी मेहनत और अपनों को भूल जाते हैं। यह कहानी 'आनंदपुर' के एक तेज़ तर्रार लड़के विक्रम की है, जिसने जीतना तो सीखा पर उस जीत को संभालना नहीं। आइए जानते हैं कि कैसे एक हार ने उसे जीवन की सबसे बड़ी जीत दिलाई।

आनंदपुर का उड़न-छल्ला: विक्रम

हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा गाँव था—'आनंदपुर'। यहाँ के बच्चे खेल-कूद में बहुत आगे थे। इसी गाँव में विक्रम नाम का एक 12 साल का लड़का रहता था। विक्रम को पूरा गाँव 'उड़न-छल्ला' कहता था क्योंकि वह बिजली की रफ़्तार से दौड़ता था। स्कूल की हर रेस में विक्रम ही प्रथम आता था।

शुरुआत में विक्रम बहुत मेहनती और विनम्र था। वह अपने कोच 'उस्ताद जी' की हर बात मानता था और अपने दोस्तों के साथ मिलकर अभ्यास करता था। उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी ममता, जो भले ही विक्रम जितनी तेज़ नहीं थी, पर वह बहुत समझदार थी। वह हमेशा कहती, "विक्रम, तुम्हारी रफ़्तार कुदरत की देन है, इसे अपनी मेहनत से संवारो।"

जब 'जीत का नशा' सिर चढ़कर बोलने लगा

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कहते हैं कि लगातार मिलने वाली सफलता कभी-कभी इंसान का दिमाग खराब कर देती है। विक्रम के साथ भी यही हुआ। उसने ज़िला स्तर (District Level) पर तीन स्वर्ण पदक जीते। अब उसे लगने लगा कि उसे किसी अभ्यास की ज़रूरत नहीं है।

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उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा:

  1. उसने उस्ताद जी के निर्देशों को अनसुना करना शुरू कर दिया।

  2. वह अभ्यास के समय पर देर से आने लगा या बहाने बनाकर गायब रहने लगा।

  3. उसने अपने पुराने दोस्तों, खासकर ममता का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया।

विक्रम अक्सर कहता, "अब मुझे कौन हरा सकता है? मैं तो पैदाइशी चैंपियन हूँ। तुम लोग तो कछुए की तरह दौड़ते हो।" इसे ही कहते हैं "जीत का नशा"—जहाँ इंसान को अपनी मेहनत कम और अपनी किस्मत या प्रतिभा पर घमंड ज्यादा होने लगता है।

उस्ताद जी की चेतावनी

एक दिन अभ्यास के दौरान विक्रम अपनी नई जूतों की चमक दिखा रहा था। उस्ताद जी ने उसे पास बुलाया और कहा, "विक्रम, मैदान पर जूते नहीं, इरादे दौड़ते हैं। तुम्हारा नशा तुम्हें गड्ढे में गिरा देगा। कल राज्य स्तर (State Level) की रेस है, अगर तुम आज नहीं दौड़े, तो कल पछताओगे।"

विक्रम ने लापरवाही से कंधे उचकाए और बोला, "उस्ताद जी, आप फिक्र मत कीजिए। मेरे पैर खुद-ब-खुद जीत का रास्ता जानते हैं।" उस्ताद जी ने बस ठंडी आह भरी और ममता की ओर देखा जो चुपचाप पसीना बहा रही थी।

राज्य स्तरीय रेस और घमंड का टूटना

अगले दिन 'विजय स्टेडियम' में भारी भीड़ थी। राज्य भर के सबसे तेज़ धावक आए हुए थे। विक्रम अपनी चिर-परिचित मुस्कान और अकड़ के साथ खड़ा था। रेस शुरू हुई।

शुरुआत में विक्रम सबसे आगे था। उसे लगा कि यह रेस भी उसके लिए बच्चों का खेल है। आधे रास्ते तक पहुँचते-पहुँचते उसे इतना आत्मविश्वास हो गया कि वह पीछे मुड़कर देखने लगा और दर्शकों की ओर हाथ हिलाने लगा। उसे लगा कि कोई उसके आसपास भी नहीं है।

लेकिन तभी एक शांत और दृढ़ रफ़्तार ने उसे पीछे छोड़ना शुरू किया। वह सुमित था, एक ऐसा धावक जिसने पिछले एक साल से बिना रुके, बिना शोर मचाए कड़ी मेहनत की थी। विक्रम ने जब देखा कि सुमित उससे आगे निकल रहा है, तो उसने तेज़ दौड़ने की कोशिश की। लेकिन पिछले कई हफ्तों से अभ्यास न करने के कारण उसकी सांसें फूलने लगीं और उसके पैरों में खिंचाव (Cramp) आ गया।

विक्रम लड़खड़ा गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह फिनिश लाइन से कुछ ही मीटर पहले गिर पड़ा। सुमित रेस जीत गया, और यहाँ तक कि ममता ने भी विक्रम को पीछे छोड़ते हुए तीसरा स्थान प्राप्त किया।

हार का कड़वा स्वाद

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विक्रम ज़मीन पर पड़ा था। स्टेडियम की तालियाँ सुमित के लिए गूँज रही थीं। वह 'जीत का नशा' पल भर में उतर गया था। जो दर्शक कल तक उसकी जय-जयकार करते थे, वे अब उसकी लापरवाही पर फुसफुसा रहे थे।

ममता उसके पास आई और उसे सहारा देकर उठाया। विक्रम की आँखों में आँसू थे। उसने रुंधे गले से कहा, "ममता, मैं हार गया। मेरा घमंड चूर-चूर हो गया।"

ममता ने शांति से कहा, "विक्रम, तुम अपनी रफ़्तार से नहीं, अपनी लापरवाही और घमंड से हारे हो। जीत जब तक प्रेरणा बनी रहे, अच्छी है, पर जब वह नशा बन जाए, तो वह आपकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाती है।"

निष्कर्ष: एक नई शुरुआत और सच्ची अमरता

विक्रम ने उस दिन एक बड़ी सीख ली। उसने उस्ताद जी के पैर छुए और अपनी गलतियों की माफ़ी मांगी। उसने समझा कि "जो जीता वही सिकंदर" वह नहीं होता जो एक बार जीत जाए, बल्कि वह होता है जो अपनी जीत को विनम्रता के साथ सँभाले और हर दिन नया सीखने की कोशिश करे।

अगले साल विक्रम फिर से दौड़ा, पर इस बार उसके चेहरे पर घमंड नहीं, बल्कि एक मज़बूत संकल्प था। उसने रेस जीती, लेकिन इस बार उसने मेडल पहनकर सबसे पहले सुमित से हाथ मिलाया और अपने गुरु का आशीर्वाद लिया। आनंदपुर में अब विक्रम केवल एक 'धावक' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'महान खिलाड़ी' के रूप में पहचाना जाता था।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

यह कहानी हमें सिखाती है कि "सफलता को पचाना, उसे हासिल करने से ज्यादा कठिन है।" कभी भी अपनी जीत पर इतना घमंड न करें कि आप सीखना और मेहनत करना छोड़ दें। "जीत का नशा" आपकी प्रतिभा को नष्ट कर सकता है। विनम्रता और निरंतर अभ्यास ही आपको लंबे समय तक विजेता बनाए रखते हैं। असली चैंपियन वह है जिसके पैर ज़मीन पर हों, भले ही उसका सिर आसमान छू रहा हो।

खेलों में खेल भावना और अनुशासन के महत्व के बारे में और अधिक जानने के लिए आप खेल भावना - विकिपीडिया देख सकते हैं। 

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